
एक आंच ठहरी है
सतरंगी सपने वाले पेड़ों की ज़ड़ों में
और डालों पर लगते हैं
आग के फूल
रक्ताभ लाल
सोचता हूँ
इन आग के फूलों वाले
काफिर पेड़ों को जब तक
मुसलमान बनाया जाएगा
झड़ ही जायेंगे पेड़ के फूल
तब ठूंठों की जमात से
कौन सा कलमा पढ़ाया जाएगा ?
आख़िर किसी भी धर्म में
मर्सिया... कलमा तो नहीं होता
3 comments:
bahut khoobsurat...lajavaab...
bahut badiya!!!!!!!!!!!
bahut achchha.Isi tarah likhte rahiye
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