समय की अलगनी पर
अब भी लटके पड़े हैं
मेरे द्वारा उतारे गए
कितने जिस्म
जो लोगों को कपड़े दिखते हैं
एक जिस्म वह है
जो छोड़ आया था
माँ की स्नेहिल क़दमों के तले
जो अब तक सिसक रहा है
वहीं पड़े
एक जिस्म वह जो
अब तक रोता है
बाप की छाती से लगकर कि
मैंने कुछ बनने का
वायदा किया था
दूर से आती है
मेरे अरमानों के सिसकने की आवाजें
वहीं मेज पर पड़ी है
मेरी पहली कमाई से
खरीदी गई शाँल
जो पिता के लिए थी, जिसे
ओढ़कर भईया अब भी देखते हैं मुझे
जब तब
आदमी की तो फितरत है
क्यों समय!
अब तुम भी
कपड़े बदलने लगे
Thursday, June 5, 2008
Tuesday, June 3, 2008
द्वंद्व
काश्मीर
पीले गुलाबों का रंग
चम्पई धूप में खिले
पीले गुलाबों का रंग
इन आंखों से कबका उतर जाता
गर उनसे जुड़ी
तुम्हारी यादें न होतीं
सच है
पुराने मौसमों में खिले
फूलों के रंग
कभी नही जाते हैं
पीले गुलाबों का रंग
इन आंखों से कबका उतर जाता
गर उनसे जुड़ी
तुम्हारी यादें न होतीं
सच है
पुराने मौसमों में खिले
फूलों के रंग
कभी नही जाते हैं
Monday, June 2, 2008
नियति
मैं तुमसे मिलूंगा
इतिहास के पन्नों में दर्ज होने से पहले
यह मेरा वादा है
पर ठीक ऐसा का ऐसा ही
यह कहना आज थोड़ा कठिन है, कल
नामुमकिन होगा
तुम्हारे काले घने बालों के अनंत में
जब एक अनाम रिश्ते का सूरज
अंगुलियों सा सिहरेगा
तब ठूंठ हो चुकी रिश्ते की शाख पर
मैं एक पीला गुलाब तब भी बचाए रखूंगा
पर यह कहना आज थोड़ा कठिन है, कल
शायद नामुमकिन हो कि
मैं तब भी बचा पाउँगा
अपनी हथेली में सपने और
तुम्हारी गर्म गालों का एहसास
तब शायद मेरे टूटे जूते में ही हो जाए
पूरी की पूरी बरसात
इतिहास के पन्नों में दर्ज होने से पहले
यह मेरा वादा है
पर ठीक ऐसा का ऐसा ही
यह कहना आज थोड़ा कठिन है, कल
नामुमकिन होगा
तुम्हारे काले घने बालों के अनंत में
जब एक अनाम रिश्ते का सूरज
अंगुलियों सा सिहरेगा
तब ठूंठ हो चुकी रिश्ते की शाख पर
मैं एक पीला गुलाब तब भी बचाए रखूंगा
पर यह कहना आज थोड़ा कठिन है, कल
शायद नामुमकिन हो कि
मैं तब भी बचा पाउँगा
अपनी हथेली में सपने और
तुम्हारी गर्म गालों का एहसास
तब शायद मेरे टूटे जूते में ही हो जाए
पूरी की पूरी बरसात
जंगल, शहर या मैं
मैं एक जलता हुआ पेड़
मुझे निर्वासित किया है जंगल ने
जलने के डर से
अब रोज मुझमे एक जंगल जलता है
शहर पैदा होता है
फिर शहर फैलता है मुझमें
जंगल बनता है
इसी तरह मैं जीवित रहता हूँ
मैं जीवित रहता हूँ
इसलिए जलता हूँ
मैं जंगल, शहर या फिर
दोनों में ही
मरता हुआ पेड़ हूँ
मुझे निर्वासित किया है जंगल ने
जलने के डर से
अब रोज मुझमे एक जंगल जलता है
शहर पैदा होता है
फिर शहर फैलता है मुझमें
जंगल बनता है
इसी तरह मैं जीवित रहता हूँ
मैं जीवित रहता हूँ
इसलिए जलता हूँ
मैं जंगल, शहर या फिर
दोनों में ही
मरता हुआ पेड़ हूँ
Friday, May 30, 2008
ऐ इन्द्रधनुष
तुम्हारे चेहरे पर
पकती धूप
फिर गुनगुनाई है
पत्थरों के माथे पर
पसीने की बूंदे
थिरक आई है
ये क्या कहा है
तुमने गुलशन से
फूलों की रंगत
फिर शरमाई है
एक बार जो रंग
तुम मुझे भी दो उधार
बाँट दूँ दुनिया मे
रंग- ए- प्यार
ऐ इन्द्रधनुष
कभी तो
मेरे पते पर भी आ
पकती धूप
फिर गुनगुनाई है
पत्थरों के माथे पर
पसीने की बूंदे
थिरक आई है
ये क्या कहा है
तुमने गुलशन से
फूलों की रंगत
फिर शरमाई है
एक बार जो रंग
तुम मुझे भी दो उधार
बाँट दूँ दुनिया मे
रंग- ए- प्यार
ऐ इन्द्रधनुष
कभी तो
मेरे पते पर भी आ
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